सोमवार, 19 सितंबर 2011

कोलकाता यात्रा पर हुए एक तजुर्बे की याद.....


हर तरफ खुदा ही खुदा दिखता है यहाँ



इधर खुदा है, उधर खुदा है,


जिधर देखो उधर खुदा है,


इधर-उधर बस खुदा ही खुदा है


जिधर नही खुदा है….उधर कल खुदेगा!


कल नही तो परसों, लेकिन खुदेगा ज़रूर...

2 टिप्‍पणियां:

  1. वाह...वाह...शब्दों के हेर फेर से कमाल की रचना प्रस्तुत की है आपने...

    नीरज

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  2. बहुत बहुत शुक्रिया नीरज भाई...

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